krishna leela · Day 269 · Week 39

मुख में ब्रह्मांड

यह कहानी एक माँ के प्रेम की शक्ति की खोज करती है जो सबसे अलौकिक, दिव्य अनुभवों को भी सरल, मानवीय कोमलता में स्थापित करती है। यह दर्शाती है कि एक पालनकर्ता की भूमिका चुनना अपने आप में एक पवित्र कार्य है।

वह एक भक्त की तरह अपने भगवान के चरणों में गिर सकती थीं। इसके बजाय, उन्होंने उसे अपनी बाहों में खींच लिया, एक माँ ने अपने बच्चे को गले से लगा लिया।

गोकुल का सूरज यशोदा के कंधों पर एक गर्म कंबल की तरह था, जब वह आँगन में बैठी थीं। उनकी लकड़ी की मथनी की लयबद्ध 'थप-थप' एक परिचित गीत थी, जो ताज़ा मक्खन बनाते समय गति में एक ध्यान की तरह थी। उनकी आँखें, एक नरम, सतर्क प्रेम से भरी, उस आँगन को देख रही थीं जहाँ उनके कान्हा अपने बड़े भाई बलराम और उनके दोस्तों के साथ खेल रहे थे।

वह खुशी का एक बवंडर था, उसकी हँसी छोटी घंटियों की तरह थी। लेकिन शांत क्षणों का मतलब अक्सर यह होता था कि शरारत पक रही है। और कृष्ण अभी बहुत, बहुत शांत हो गए थे।

अचानक, कृष्ण के एक छोटे से साथी, सुबाला, उनके पास दौड़ा आया, उसका चेहरा बचकानी नाराज़गी की एक आदर्श तस्वीर था। "यशोदा मैया! कान्हा मिट्टी खा रहा है!"

यशोदा ने मथना बंद कर दिया, उनके होठों पर एक छोटी सी मुस्कान खेल रही थी। बलराम, हमेशा की तरह गंभीर बड़े भाई, पास आए और गंभीरता से सिर हिलाया। "यह सच है, मैया। मैंने उसे देखा।"

उन्होंने एक आह भरी, एक ऐसी ध्वनि जो आधी झुंझलाहट और आधी गहरे स्नेह की थी। उन्होंने पुकारा, उनकी आवाज़ दृढ़ लेकिन कोमल थी, "कान्हा! यहाँ आओ।"

एक छोटी सी आकृति बरगद के पौधे के पीछे से निकली। वह उनकी ओर लपका, उसका चेहरा बनावटी मासूमियत का मुखौटा था। लेकिन उसके सुंदर, धनुष के आकार के मुँह के कोने पर गहरी धरती का एक révélateur धब्बा बना हुआ था।

"लल्ला," उन्होंने अपनी आवाज़ को कठोर रखने की कोशिश करते हुए कहा। "क्या तुमने मिट्टी खाई? तुम्हारे दोस्त कहते हैं कि तुमने खाई है।"

उसने अपना सिर हिलाया, उसके काले घुंघराले बाल उछल पड़े। उसकी बड़ी, कमल जैसी आँखें चौड़ी और भोली थीं। "नहीं, मैया," वह बुदबुदाया। "वे गलत हैं। बलराम मुझे पसंद नहीं करते, वे हमेशा मेरे बारे में झूठ बोलते हैं।"

दूसरे बच्चे विरोध में फूट पड़े। "नहीं! हमने देखा!"

यशोदा का धैर्य सत्य की एक सरल आवश्यकता में नरम हो गया। "कान्हा, मेरे प्यारे। बस अपना मुँह खोलो और मुझे दिखाओ। तब हम सब जान जाएँगे।"

वह हिचकिचाया। एक बच्चे की जिद्द से प्रतिस्थापित होने से पहले उसकी आँखों से कुछ प्राचीन और जानने वाला एक पलक झपका। उसने अपना छोटा सा मुँह बंद कर लिया।

"इसे खोलो, कान्हा," उन्होंने फुसलाया, उनकी आवाज़ अब धीमी, अधिक अंतरंग थी। यह बस उन दोनों के बीच था।

धीरे-धीरे, अनिच्छा से, उसने अपना मुँह खोला।

यशोदा अंदर झाँकी, मिट्टी का धब्बा देखने की उम्मीद कर रही थी, एक छोटी सी डांट देने और फिर पानी से उसका मुँह धोने के लिए तैयार थी। लेकिन उन्हें कोई मिट्टी नहीं दिखाई दी।

इसके बजाय, उन्होंने ब्रह्मांड देखा।

उसकी कोई तस्वीर नहीं, कोई प्रतीक नहीं। उन्होंने स्वयं उस चीज़ को देखा। शिशु तारों के घूमते हुए নীहारिकाएँ, अंतहीन ब्रह्मांडीय नृत्य में घूमती हुई मूक आकाशगंगाएँ। उन्होंने सूर्य और चंद्रमा, ऐसे ग्रह जिनके नाम उन्हें नहीं पता थे, शून्य में आग के रास्ते बनाते हुए धूमकेतु देखे। यह सब वहाँ था, उनके बेटे के मुँह के छोटे, अंधेरे स्थान के भीतर समाहित था।

उनकी साँस गले में अटक गई। मथनी का हत्था उनके हाथ से फिसल गया। आँगन धुंधला हो गया।

उन्होंने पूरे अंतरिक्ष को देखा, और फिर पूरे समय को। अतीत, वर्तमान, भविष्य, सब एक साथ हो रहा है। उन्होंने पहाड़ों को उठते और गिरते, महासागरों को बनते और सूखते देखा। उन्होंने दुनिया के सभी प्राणियों को जीते और मरते देखा। और फिर, चक्कर के एक क्षण में जिसने लगभग उनके घुटने मोड़ दिए, उन्होंने खुद को देखा। उन्होंने गोकुल के आँगन में यशोदा को अपने पुत्र कान्हा के मुँह में झाँकते हुए देखा।

यह बहुत ज़्यादा था। इसका विशाल पैमाना, शक्ति, भयानक दिव्यता। वह कौन थी जो इसकी माँ बन सके? वह इस शाश्वत, ब्रह्मांडीय प्राणी के सामने धूल का एक कण, एक पल की एक झलक थी।

उनका दिल उनकी पसलियों के खिलाफ जोर से धड़क रहा था, शुद्ध विस्मय और आतंक की एक धुन। यह उनका बेटा नहीं था। यह भगवान था।

फिर, जितनी जल्दी यह प्रकट हुआ था, दृष्टि चली गई थी। ब्रह्मांड अपने आप में सिमट गया, आकाशगंगाएँ पीछे हट गईं, और तारे बुझ गए। जो बचा वह एक छोटे लड़के का छोटा, गुलाबी, साधारण मुँह था।

उसने इसे बंद कर दिया और उनकी ओर देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था। वह बहुत छोटा, बहुत कमजोर लग रहा था।

यशोदा के हृदय में ब्रह्मांडीय भय कम हो गया। विस्मय बना रहा, लेकिन यह बदल गया था। उन्होंने उसके चेहरे को देखा, मिट्टी के उस छोटे से धब्बे को जो वह भूल गया था। उन्होंने उसकी आँखों में चिंता देखी - एक देवता की नहीं, बल्कि एक बच्चे की चिंता जिसे डर है कि उसने अपनी माँ को परेशान कर दिया है।

उसी क्षण, यशोदा ने एक चुनाव किया।

वह ब्रह्मांड के भगवान के सामने एक विनम्र भक्त के रूप में उनके चरणों में गिर सकती थीं। वह अपना शेष जीवन पूजा और प्रार्थना में बिता सकती थीं। लेकिन उनका दिल यह नहीं चाहता था।

उनका दिल उसके चेहरे से गंदगी पोंछना चाहता था। उनका दिल अपनी गोद में उसका वजन महसूस करना चाहता था। उनका दिल उसे धीरे से डांटना और फिर उसे गर्म मक्खन खिलाना चाहता था।

उन्होंने एक भक्त न बनना चुना। उन्होंने उसकी माँ बनना चुना।

यह गहन कृपा का क्षण था। उन्होंने प्रार्थना में नहीं, बल्कि प्रेम में हाथ बढ़ाया। उनके कांपते हाथों ने उसे पास खींच लिया, उनकी बाहों के घेरे में, उनके दिल की उन्मत्त धड़कन के खिलाफ। उन्होंने उसे कसकर पकड़ लिया, अपने बेटे, अपने कान्हा को।

उन्होंने उसके सिर के ऊपर चूमा, धूप और बचपन की महक में साँस ली। आतंक चला गया था, एक ऐसी कोमलता से प्रतिस्थापित हो गया था जो इतनी भयंकर थी कि एक ढाल की तरह महसूस हुई।

"कोई बात नहीं," उन्होंने उसके काले घुंघराले बालों में फुसफुसाया। उनकी आवाज़ फिर से स्थिर थी, एक माँ की आवाज़।

उन्होंने उसे उठा लिया। वह ठोस, और असली था, और उनकी बाहों में आश्चर्यजनक रूप से, सामान्य रूप से भारी था। "तुम्हें भूख लगी होगी," उन्होंने कहा, उनका ब्रह्मांड इस एक छोटे लड़के, इस एक आदर्श क्षण में सिकुड़ गया। और अपने भगवान पर अपने बेटे को चुनकर, उन्होंने एक ऐसी भक्ति पाई जो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, उससे कहीं अधिक गहरी थी।

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